Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-दूसरा अध्याय-संख्या योग(Bhagwad Gita chapter-2)

(सांख्ययोग का विषय


श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ (११)


भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! तू उनके लिये शोक करता है जो शोक करने योग्य नहीं है और पण्डितों की तरह बातें करता है। जो विद्वान होते हैं, वे न तो जीवित प्राणी के लिये और न ही मृत प्राणी के लिये शोक करते। (११)

Sri Bhagavån said: Arjuna, you grieve over
those who should not be grieved for and yet speak
like the learned; wise men do not sorrow over the
dead or the living.


न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌ ॥ (१२)


भावार्थ : ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं किसी भी समय में नहीं था, या तू नहीं था अथवा ये समस्त राजा नहीं थे और न ऐसा ही होगा कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे। (१२)

In fact, there was never a time when I was not,
or when you or these kings were not. Nor is it a
fact that hereafter we shall all cease to be.


देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ (१३)


भावार्थ : जिस प्रकार जीवात्मा इस शरीर में बाल अवस्था से युवा अवस्था और वृद्ध अवस्था को निरन्तर अग्रसर होता रहता है, उसी प्रकार जीवात्मा इस शरीर की मृत्यु होने पर दूसरे शरीर में चला जाता है, ऎसे परिवर्तन से धीर मनुष्य मोह को प्राप्त नहीं होते हैं। (१३)

Just as boyhood, youth and old age are
attributed to the soul through this body, even so
it attains another body. The wise man does not
get deluded about this.


मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ (१४)


भावार्थ : हे कुंतीपुत्र! सुख-दुःख को देने वाले विषयों के क्षणिक संयोग तो केवल इन्द्रिय-बोध से उत्पन्न होने वाले सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के समान आने-जाने वाले हैं, इसलिए हे भरतवंशी! तू अविचल भाव से उनको सहन करने का प्रयत्न कर। (१४)

O son of Kunti, the contacts between the senses
and their objects, which give rise to the feelings of
heat and cold, pleasure and pain etc., are transitory
and fleeting; therefore, Arjuna, endure them.


यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ (१५)


भावार्थ : हे पुरुष श्रेष्ठ! जो मनुष्य दुःख तथा सुख में कभी विचलित नहीं होता है, दोनों परिस्थितियों में सम-भाव रखता है, ऎसा धीर-पुरुष निश्चित रुप से मुक्ति के योग्य होता है। (१५)

Arjuna, the wise man to whom pain and pleasure
are alike, and who is not tormented by these
contacts, becomes eligible for immortality.


नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ (१६)


भावार्थ : तत्वदर्शीयों के द्वारा निष्कर्ष निकाल कर देखा गया है कि असत्‌ वस्तु (शरीर) का कोई अस्तित्व नहीं होता है और सत्‌ वस्तु(आत्मा) में कोई परिवर्तन नही होता है। (१६)

The unreal has no existence, and the real never
ceases to be; the reality of both has thus been
perceived by the seers of Truth.


अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌ ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ (१७)


भावार्थ : जो सभी शरीरों में व्याप्त है उस आत्मा को ही तू अविनाशी समझ, इसको नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है। (१७)

Know that alone to be imperishable which
pervades this universe; for no one has power to
destroy this indestructible substance.


अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ (१८)


भावार्थ : इस अविनाशी, अमाप, नित्य-स्वरूप आत्मा के ये सब शरीर नष्ट होने वाले हैं, अत: हे भरतवंशी! तू युद्ध कर। (१८)

All these bodies pertaining to the imperishable,
indefinable and eternal soul are spoken of as
perishable; therefore, Arjuna, fight.


य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌ ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ (१९)


भावार्थ : जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा हुआ समझता है, वे दोनों ही अज्ञानी है, क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है। (१९)

Both of them are ignorant, he who considers the
soul to be capable of killing and he who takes it as
killed; for verily the soul neither kills, nor is killed.


न जायते म्रियते वा कदाचि-न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (२०)


भावार्थ : यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्म लेता है और न मरता है और न ही जन्म लेगा, यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जा सकता है। (२०)

The soul is never born, nor it ever dies; nor
does it become after being born. For, it is unborn,
eternal, everlasting and primeval; even though
the body is slain, the soul is not.


वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌ ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌ ॥ (२१)


भावार्थ : हे पृथापुत्र! जो मनुष्य इस आत्मा को अविनाशी, शाश्वत, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह मनुष्य किसी को कैसे मार सकता है या किसी के द्वारा कैसे मारा जा सकता है? (२१)

Arjuna, the man who knows this soul to be
imperishable; eternal and free from birth and
decayóhow and whom will he cause to be killed,
how and whom will he kill?


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ (२२)


भावार्थ : जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रों को धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नये शरीरों को धारण करता है। (२२)

As a man shedding worn-out garments, takes
other new ones, likewise, the embodied soul, casting
off worn-out bodies, enters into others that are new.


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ (२३)


भावार्थ : यह आत्मा न तो शस्त्र द्वारा काटा सकता है, न ही आग के द्वारा जलाया जा सकता है, न जल द्वारा भिगोया जा सकता है और न ही वायु द्वारा सुखाया जा सकता है। (२३)

Weapons cannot cut it nor can fire burn it;
water cannot wet it nor can wind dry it.


अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ (२४)


भावार्थ : यह आत्मा न तो तोडा़ जा सकता है, न ही जलाया जा सकता है, न इसे घुलाया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है, यह आत्मा शाश्वत, सर्वव्यापी, अविकारी, स्थिर और सदैव एक सा रहने वाला है। (२४)

For this soul is incapable of being cut, or burnt
by fire; nor can it be dissolved by water and is undriable
by air as well; This soul is eternal, all-pervading,
immovable, constant and everlasting.


अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥ (२५)


भावार्थ : यह आत्मा अदृश्य, अकल्पनीय, और अपरिवर्तनीय कहा जाता है, इस प्रकार आत्मा को अच्छी तरह जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है। (२५)

This soul is unmanifest; it is incomprehensible
and it is spoken of as immutable. Therefore,
knowing it as such, you should not grieve.


अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌ ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ (२६)


भावार्थ : हे महाबाहु! यदि तू इस आत्मा को सदा जन्म लेने वाला तथा सदा मरने वाला मानता है, तो भी तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है। (२६)

And, Arjuna, if you should suppose this soul
to be subject to constant birth and death, even
then you should not grieve like this.


जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ (२७)


भावार्थ : जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म निश्चित है, अत: इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है। (२७)

For, in that case death is certain for the born,
and rebirth is inevitable for the dead. You should
not, therefore, grieve over the inevitable.


अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ (२८)


भावार्थ : हे भरतवंशी! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट रहते है और मरने के बाद भी अदृश्य हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही इन्हे देखा जा सकता हैं, अत: शोक करने की कोई आवश्यकता नही है? (२८)

Arjuna, before birth beings are not manifest to
our human senses; on death they return to the
unmanifest again. They are manifest only in the
interim between birth and death. What occasion,
then, for lamentation?


आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌ ॥ (२९)


भावार्थ : कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई इसका आश्चर्य की तरह वर्णन करता है तथा कोई इसे आश्चर्य की तरह सुनता है और कोई-कोई तो इसके विषय में सुनकर भी कुछ नहीं समझ पाता है। (२९)

Hardly any great soul perceives this soul as
marvellous, scarce another great soul likewise
speaks there of as marvellous, and scarce another
worthy one hears of it as marvellous, while there are
some who know it not even on hearing of it.


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ (३०)


भावार्थ : हे भरतवंशी! इस आत्मा का शरीर में कभी वध नहीं किया जा सकता है, अत: तुझे किसी भी प्राणी के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है। (३०)

Arjuna, this soul dwelling in the bodies of
all, can never be slain; therefore, you should not
mourn for anyone.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s