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Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-सत्रहवाँ अध्याय-श्रद्धा त्रय योग(Bhagwad Gita chapter-17)

(स्वभाव के अनुसार आहार, यज्ञ, तप और दान)

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । 
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ॥ (७)

भावार्थ : हे अर्जुन! सभी मनुष्यों का भोजन भी प्रकृति के गुणों के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है, और यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं, इनके भेदों को तू मुझ से सुन। (७) 

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । 
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ (८)

भावार्थ : जो भोजन आयु को बढाने वाले, मन, बुद्धि को शुद्ध करने वाले, शरीर को स्वस्थ कर शक्ति देने वाले, सुख और संतोष को प्रदान करने वाले, रसयुक्त चिकना और मन को स्थिर रखने वाले तथा हृदय को भाने वाले होते हैं, ऐसे भोजन सतोगुणी मनुष्यों को प्रिय होते हैं। (८)

 कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । 
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ (९)

भावार्थ : कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यधिक गरम, चटपटे, रूखे, जलन उत्पन्न करने वाले भोजन रजोगुणी मनुष्यों को रुचिकर होते हैं, जो कि दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं। (९) 

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌ । 
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌ ॥ (१०)

भावार्थ : जो भोजन अधिक समय का रखा हुआ, स्वादहीन, दुर्गन्धयुक्त, सड़ा हुआ, अन्य के द्वारा झूठा किया हुआ और अपवित्र होता है, वह भोजन तमोगुणी मनुष्यों को प्रिय होता है। (१०)

 अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । 
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ (११)

भावार्थ : जो यज्ञ बिना किसी फल की इच्छा से, शास्त्रों के निर्देशानुसार किया जाता है, और जो यज्ञ मन को स्थिर करके कर्तव्य समझकर किया जाता है वह सात्त्विक यज्ञ होता है। (११) 

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌ । 
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌ ॥ (१२)

भावार्थ : परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ केवल फल की इच्छा के लिये अहंकार से युक्त होकर किया जाता है उसको तू राजसी यज्ञ समझ। (१२) 

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌ । 
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ (१३)

भावार्थ : जो यज्ञ शास्त्रों के निर्देशों के बिना, अन्न का वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना और श्रद्धा के बिना किये जाते हैं, उन यज्ञ को तामसी यज्ञ माना जाता हैं। (१३) 

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌ । 
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ (१४)

भावार्थ : ईश्वर, ब्राह्मण, गुरु, माता, पिता के समान पूज्यनीय व्यक्तियों का पूजन करना, आचरण की शुद्धता, मन की शुद्धता, इन्द्रियों विषयों के प्रति अनासक्ति और मन, वाणी और शरीर से किसी को भी कष्ट न पहुँचाना, शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। (१४)

 अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌ । 
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते ॥ (१५)

भावार्थ : किसी को भी कष्ट न पहुँचाने वाले शब्द वोलना, सत्य वोलना, प्रिय लगने वाले हितकारी शब्द वोलना और वेद-शास्त्रों का उच्चारण द्वारा अध्यन करना, वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है। (१५) 

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । 
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ (१६)

भावार्थ : मन में संतुष्टि का भाव, सभी प्राणीयों के प्रति आदर का भाव, केवल ईश्वरीय चिन्तन का भाव, मन को आत्मा में स्थिर करने का भाव और सभी प्रकार से मन को शुद्ध करना, मन सम्बन्धी तप कहा जाता है। (१६) 

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । 
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ (१७)

भावार्थ : पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर मनुष्यों द्वारा बिना किसी फल की इच्छा से उपर्युक्त तीनों प्रकार से जो तप किया जाता है उसे सात्विक (सतोगुणी)तप कहा जाता है। (१७)

 सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌ । 
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌ ॥ (१८)

भावार्थ : जो तप आदर पाने की कामना से, सम्मान पाने की इच्छा से और पूजा कराने के लिये स्वयं को निश्चित रूप से कर्ता मानकर किया जाता है, उसे क्षणिक फल देने वाला राजसी (रजोगुणी) तप कहा जाता है। (१८)

 मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌ ॥ (१९)

भावार्थ : जो तप मूर्खतावश अपने सुख के लिये दूसरों को कष्ट पहुँचाने की इच्छा से अथवा दूसरों के विनाश की कामना से प्रयत्न-पूर्वक किया जाता है, उसे तामसी (तमोगुणी) तप कहा जाता है। (१९) 

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । 
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌ ॥ (२०)

भावार्थ : जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी उपकार की भावना से, उचित स्थान में, उचित समय पर और योग्य व्यक्ति को ही दिया जाता है, उसे सात्त्विक (सतोगुणी) दान कहा जाता है। (२०) 

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । 
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌ ॥ (२१)

भावार्थ : किन्तु जो दान बदले में कुछ पाने की भावना से अथवा किसी प्रकार के फल की कामना से और बिना इच्छा के दिया जाता है, उसे राजसी (रजोगुणी) दान कहा जाता है। (२१) 

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । 
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌ ॥ (२२)

भावार्थ : जो दान अनुचित स्थान में, अनुचित समय पर, अज्ञानता के साथ, अपमान करके अयोग्य व्यक्तियों को दिया जाता है, उसे तामसी(तमोगुणी) दान कहा जाता है। (२२) 

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