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Shubhasitani

सुभाषितानि (Shubhasitani) Part-3

कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। 
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा ॥

फूलों की तरह मनस्वियों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभितहोते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं ॥

Like a flower, great men have only two ways, either they shine on top of everyone or decay unnoticed in the forest.


Great Sanskrit

मन्दोऽप्यमन्दतामेति संसर्गेण विपश्चितः। 
पङ्कच्छिदः फलस्येव निकषेणाविलं पयः॥

बुद्धिमानों के साथ से मंद व्यक्ति भी बुद्धि प्राप्त कर लेते हैं जैसे रीठे के फलसे उपचारित गन्दा पानी भी स्वच्छ हो जाता है ॥

Even a dull person becomes sharp by keeping company with the wise, as turbid water becomes clear when treated with the dust-removing fruit of ‘Reetha’. 


Great Sanskrit

नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा। 
शीलं च दुर्लभं तत्र विनयस्तत्र सुदुर्लभः॥

पृथ्वी पर मनुष्य जन्म मिलना दुर्लभ है, उनमें भी विद्या युक्त मनुष्य मिलना और दुर्लभ है, उनमें भी चरित्रवान मनुष्य मिलना दुर्लभ है और उनमें भी विनयी मनुष्य मिलना और दुर्लभ है ॥

To born as human is rare in this world. To be knowledgeable also is even rarer. To have great character is even more rare . To be humble is the rarest of all. 


Great Sanskrit

अकिञ्चनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः। 
मया सन्तुष्तमानसः सर्वाः सुखमया दिशाः॥

कुछ न रखने वाले, नियंत्रित , शांत, समान चित्त वाले, मन से संतुष्ट मनुष्य के लिए सभी दिशाएं सुखमय हैं ॥

For a man having nothing, controlled, peaceful, even-tempered and self-content all the directions are pleasant.


Great Sanskrit

आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः। 
आचारः परमं ज्ञानम् आचरात् किं न साध्यते॥

सदाचरण सबसे बड़ा धर्म है, सदाचरण सबसे बड़ा तप है, सदाचरण सबसे बड़ा ज्ञान है, सदाचरण से क्या प्राप्त नहीं किया जा सकता है? 

Right conduct is the highest religion. Right conduct is the greatest penance. Right conduct is the greatest knowledge. What can’t be achieved through right conduct?


Great Sanskrit

सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभते 
यथान्धकारादिवदीपदर्शनम्। 
सुखात्तु यो याति दशांदरिद्रतां 
धृतः शरीरेण मृतः स जीवति॥

दुःख का अनुभव करने के बाद ही सुख का अनुभव शोभा देता है जैसे कि घने अँधेरे से निकलने के बाद दीपक का दर्शन अच्छा लगता है। सुख से रहने के बाद जो मनुष्य दरिद्र हो जाता है, वह शरीर रख कर भी मृतक जैसे ही जीवित रहता है ॥

Only afterexperiencing miseries, one can appreciatehappiness, just as the sight of a lamp after experiencing thick darkness gives joy. One who experiencespenury after luxury, lives as a dead man.


Great Sanskrit

क्रोधो मूलमनर्थानां क्रोधः संसारबन्धनम्। 
धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥

क्रोध समस्त विपत्तियों का मूल कारण है, क्रोध संसार बंधन का कारण है, क्रोध धर्म का नाश करने वाला है, इसलिए क्रोध को त्याग दें

Anger is the root cause of all misfortunes.Anger is the reason for bondage with this world. Anger reduces righteousness, hence give up anger.


Great Sanskrit

आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्। 
सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति॥

आकाश से गिरा हुआ पानी जैसे समुद्र में जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को किया गया नमस्कार श्रीहरि को जाता है ॥

Just as all the water falling from the sky goes into sea, similarly salutations offered to all Gods go to Sri Hari . 

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