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Shubhasitani

सुभाषितानि (Shubhasitani) Part-3

कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा ॥ फूलों की तरह मनस्वियों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभितहोते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं ॥ Like a flower, great men have only two ways, either they shine on top of everyone or decay unnoticed in the forest. मन्दोऽप्यमन्दतामेति संसर्गेण विपश्चितः। पङ्कच्छिदः फलस्येव निकषेणाविलं […]

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सुभाषितानि (Shubhasitani) Part-2

स हि भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला। मनसि च परितुष्टे कोर्थवान् को दरिद्रा:॥ जिसकी कामनाएँ विशाल हैं, वह ही दरिद्र है । मन से संतुष्ट रहने वाले के लिए कौन धनी है और कौन निर्धन ॥ The person with vast desires is definitely poor. For the one with satisfied mind, there is no distinction between rich and poor.  यथा धेनुसहस्त्रेषु वत्सो विन्दति […]

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सुभाषितानि (Shubhasitani ) Part-1

महाजनस्य संसर्गः,कस्य नोन्नतिकारकः। पद्मपत्रस्थितं तोयम्,धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥ महापुरुषों का सामीप्य किसके लिए लाभदायक नहीं होता, कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद मोती जैसी शोभा प्राप्त कर लेती है। For whom is the company of great people not beneficial? Even a water droplet when on lotus petal, shines like a pearl. पातितोऽपि कराघातै- रुत्पतेयेव कन्दुकः। प्रायेण […]