Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-दशवाँ अध्याय-विभूति योग(Bhagwad Gita Chapter-10)

(भगवान की ऎश्वर्य पूर्ण योग-शक्ति)श्रीभगवानुवाचभूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान्‌ ने कहा – हे महाबाहु अर्जुन! तू मेरे परम-प्रभावशाली वचनों को फ़िर से सुन, क्योंकि मैं तुझे अत्यन्त प्रिय मानता हूँ इसलिये तेरे हित के लिये कहता हूँ। (१)न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः […]

Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-नौवाँ अध्याय- राज विद्या राज गुह्यः योग(Bhagwad Gita Chapter-9)

(सृष्टि का मूल कारण)श्रीभगवानुवाचइदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! अब मैं तुझ ईर्ष्या न करने वाले के लिये इस परम-गोपनीय ज्ञान को अनुभव सहित कहता हूँ, जिसको जानकर तू इस दुःख-रूपी संसार से मुक्त हो सकेगा। (१) राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ ।प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं […]

Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-आठवाँ अध्याय-अक्षर ब्रह्मं योग(Bhagwad Gita Chapter-8)

(अर्जुन के सात प्रश्नो के उत्तर) अर्जुन उवाचकिं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ (१)भावार्थ : अर्जुन ने पूछा – हे पुरुषोत्तम! यह “ब्रह्म” क्या है? “अध्यात्म” क्या है? “कर्म” क्या है? “अधिभूत” किसे कहते हैं? और “अधिदैव” कौन कहलाते हैं? (१) अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ […]

Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-सातवाँ अध्याय-ज्ञानविज्ञानं योग(Bhagwad Gita Chapter-7)

(विज्ञान सहित तत्व-ज्ञान)  श्रीभगवानुवाचमय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे पृथापुत्र! अब उसको सुन जिससे तू योग का अभ्यास करते हुए मुझमें अनन्य भाव से मन को स्थित करके और मेरी शरण होकर सम्पूर्णता से मुझको बिना किसी संशय के जान सकेगा। (१)ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं […]

Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-छठा अध्याय-आत्मसंयम योग(Bhagwad Gita Chapter-6)

(योग में स्थित मनुष्य के लक्षण)  श्रीभगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – जो मनुष्य बिना किसी फ़ल की इच्छा से अपना कर्तव्य समझ कर कार्य करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है, न तो अग्नि को त्यागने […]

Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-पाँचवा अध्याय-कर्मसन्यास योग(Bhagwad Gita chapter-5)

(The Yoga of Action and Knowledge) (सांख्य-योग और कर्म-योग के भेद) अर्जुन उवाचसंन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥ (१)भावार्थ : अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! कभी आप सन्यास-माध्यम(सर्वस्व का न्यास=ज्ञान योग) से कर्म करने की और कभी निष्काम माध्यम से कर्म करने (निष्काम कर्म-योग) की प्रशंसा करते हैं, इन दोनों में […]

Categories
Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-चौधा अध्याय-ज्ञानकर्मसन्यास योग(Bhagwad Gita chapter-4)

(The Yoga of Knowledge as well as the discipline of Action and Knowledge) (कर्म-अकर्म और विकर्म का निरुपण) (The glory of God with attributes;Karmayoga, or selfless action, described.) श्री भगवानुवाचइमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य […]