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Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-तीसरा अध्याय-कर्म योग(Bhagwad Gita chapter-3)

(Karmayoga, or the Yoga of Action) (कर्म-योग और ज्ञान-योग का भेद) (Importance of the performance of duty, in a detached way, according to both Jnånayoga and Karmayoga.) अर्जुन उवाचज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ (१)भावार्थ : अर्जुन ने कहा – हे जनार्दन! हे केशव! यदि आप निष्काम-कर्म मार्ग की अपेक्षा ज्ञान-मार्ग को […]

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श्रीमद्भगवद्गीता-दूसरा अध्याय-संख्या योग(Bhagwad Gita chapter-2)

“Sankhyayoga”(the Yoga of Knowledge) (अर्जुन के शोक का कारण)  संजय उवाचतं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌ ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ (१) भावार्थ : संजय ने कहा – इस प्रकार करुणा से अभिभूत, आँसुओं से भरे हुए व्याकुल नेत्रों वाले, शोकग्रस्त अर्जुन को देखकर मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह शब्द कहे। (१) Sanjaya said : Sri Krishna then addressed thefollowing […]

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श्रीमद्भगवद्गीता-प्रथम अध्याय-अर्जुनविषादयोग (Bhagwad Gita chapter-1)

(The Yoga of Dejection of Arjuna) (योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य) (Description of the principal warriorson both sides with their fighting qualities.) धृतराष्ट्र उवाचधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१)भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा – हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के […]