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Chanakya Niti

चाणक्य नीति (Chanakya Niti) chapter-13

मुहूर्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा ।न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना ॥ (13. 1) यदि आदमी एक पल के लिए भी जिए तो भी उस पल को वह शुभ कर्म करने में खर्च करे. एक कल्प तक जी कर कोई लाभ नहीं. दोनों लोक इस लोक और पर-लोक में तकलीफ होती है. A man may live but […]

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चाणक्य नीति ( Chanakya Niti ) chapter-12

सानन्दं सदनं सुतास्तु सुधियः कान्ता प्रियालापिनीइच्छापूर्तिधनं स्वयोषिति रतिः स्वाज्ञापराः सेवकाः ।आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहेसाधोः संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥ (12. 1) वह गृहस्थ भगवान् की कृपा को पा चुका है जिसके घर में आनंददायी वातावरण है. जिसके बच्चे गुणी है. जिसकी पत्नी मधुर वाणी बोलती है. जिसके पास अपनी जरूरते पूरा करने के […]