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Chanakya Niti

चाणक्य नीति (Chanakya Niti) Chapter-6

श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ (6. 1) श्रवण करने से धर्मं का ज्ञान होता है, द्वेष दूर होता है, ज्ञान की प्राप्ति होती है और माया की आसक्ति से मुक्ति होती है. By means of hearing one understands dharma, malignity vanishes,knowledge is acquired, and liberation from material bondage is […]

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Shubhasitani

सुभाषितानि (Shubhasitani ) Part-1

महाजनस्य संसर्गः,कस्य नोन्नतिकारकः। पद्मपत्रस्थितं तोयम्,धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥ महापुरुषों का सामीप्य किसके लिए लाभदायक नहीं होता, कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद मोती जैसी शोभा प्राप्त कर लेती है। For whom is the company of great people not beneficial? Even a water droplet when on lotus petal, shines like a pearl. पातितोऽपि कराघातै- रुत्पतेयेव कन्दुकः। प्रायेण […]

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Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-प्रथम अध्याय-अर्जुनविषादयोग (Bhagwad Gita chapter-1)

(The Yoga of Dejection of Arjuna) (योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य) (Description of the principal warriorson both sides with their fighting qualities.) धृतराष्ट्र उवाचधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१)भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा – हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के […]