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Aarti

Aarti Kunj Bihari ki आरती कुंज बिहारी की Lyrics

आरती कुंजबिहारी की Lyrics Hindi & English आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥ गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।लतन में ठाढ़े बनमालीभ्रमर सी अलक,कस्तूरी तिलक,चंद्र […]

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Chanakya Niti

चाणक्य नीति (Chanakya Niti) chapter-1

प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥ (1. 1) तीनो लोको के स्वामी सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु को नमन करते हुए मै एक राज्य के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों को कहता हूँ. मै यह सूत्र अनेक शास्त्रों का आधार ले कर कह रहा हूँ। Humbly bowing down before the almighty Lord Sri Vishnu, […]

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Shubhasitani

सुभाषितानि (Shubhasitani) Part-3

कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा ॥ फूलों की तरह मनस्वियों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभितहोते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं ॥ Like a flower, great men have only two ways, either they shine on top of everyone or decay unnoticed in the forest. मन्दोऽप्यमन्दतामेति संसर्गेण विपश्चितः। पङ्कच्छिदः फलस्येव निकषेणाविलं […]

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Shubhasitani

सुभाषितानि (Shubhasitani) Part-2

स हि भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला। मनसि च परितुष्टे कोर्थवान् को दरिद्रा:॥ जिसकी कामनाएँ विशाल हैं, वह ही दरिद्र है । मन से संतुष्ट रहने वाले के लिए कौन धनी है और कौन निर्धन ॥ The person with vast desires is definitely poor. For the one with satisfied mind, there is no distinction between rich and poor.  यथा धेनुसहस्त्रेषु वत्सो विन्दति […]

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Shubhasitani

सुभाषितानि (Shubhasitani ) Part-1

महाजनस्य संसर्गः,कस्य नोन्नतिकारकः। पद्मपत्रस्थितं तोयम्,धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥ महापुरुषों का सामीप्य किसके लिए लाभदायक नहीं होता, कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद मोती जैसी शोभा प्राप्त कर लेती है। For whom is the company of great people not beneficial? Even a water droplet when on lotus petal, shines like a pearl. पातितोऽपि कराघातै- रुत्पतेयेव कन्दुकः। प्रायेण […]

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Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-नौवाँ अध्याय- राज विद्या राज गुह्यः योग(Bhagwad Gita Chapter-9)

(सृष्टि का मूल कारण)श्रीभगवानुवाचइदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! अब मैं तुझ ईर्ष्या न करने वाले के लिये इस परम-गोपनीय ज्ञान को अनुभव सहित कहता हूँ, जिसको जानकर तू इस दुःख-रूपी संसार से मुक्त हो सकेगा। (१) राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ ।प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं […]

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Bhagwad Gita

श्रीमद्भगवद्गीता-प्रथम अध्याय-अर्जुनविषादयोग (Bhagwad Gita chapter-1)

(The Yoga of Dejection of Arjuna) (योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य) (Description of the principal warriorson both sides with their fighting qualities.) धृतराष्ट्र उवाचधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१)भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा – हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के […]